Tuesday, June 12, 2018

नई कहानी

Bucket List = इच्छाओं की फेहरिस्त
एक और पूरी की
धन्यवाद हंस


Sunday, June 03, 2018

तालियां

मुझे लगा था कि वो आज तो मिलने आये होंगे...मन तो नहीं था कि इतनी आसानी से उनसे मिला जाये इसलिए पहले सोचा कि बाहर लगी कुर्सियों या बेंच को, दीवार की तरफ घुमाकर रख दिया जाए, पर दीवार अगर धसककर बैठ गयी तो बेंच टूट जाएगी. थकना दीवारों का दिखने लगा था और ऐसा लगता था कि अगर उन दीवारों से पूछ लिया जाये -  बैठना चाहेंगी आप?
वो बिना सोचे-समझे धसधसाकर बैठ जाएँगी और अगर वो बैठ गयीं तो झुर्रियों से भरा वो भवन भी बैठ जायेगा. मुझे अपने कमरों की दीवारों से नफ़रत थी, कभी भी नहीं लगने दिया कि मैं अपने कार्यालय में बैठा हूँ. ये दीवारें​,​ बूढी चाचियों और मौसियों की तरह फुसफुसाती रहतीं, जो भी इनको एक साड़ी और ब्लाउज का कपड़ा थमा दे उसी के गुण गाने लगतीं. पिछले अधिकारी ने न जाने क्यों वो पीला डिस्टेंपर पुतवा दिया था, और इन बूढी मौसियों को वो पाउडर पसंद आया अपने चेहरे पर, बस उसी अधिकारी की फोटो सीने पे टांग अजीब-अजीब से मुँह बनाकर मुझको चिढ़ाती. मैंने भी कार्यभार सँभालने से पहले सोचा कि इनको वापस पुतवा दूं, पीला रंग, पीलिया की याद दिलाता, दीवारों पे ज्यादा काम करने से डर लगता, कहीं इन्होंने आखिरी सांस ले ली तो पूरा जिम्मा मेरे सर पर होगा. क्योंकिं ये बूढ़ियाँ घुटने तक हमेशा गीली रहती, एक अजीब सा भोथरपन हवा में बैठा रहता. कोई कुछ भी कर ले पर सूखी दीवार और हल्की हवा असंभव सा कार्य था जिसका प्रमाण-पत्र शहर के लगभग सभी कारीगरों ने दे दिया था.
- ज़्यादा सोचेंगे साब तो ये पूरा ऑफिस ही गिराना पड़ेगा
ये चेतावनी कम और चुनौती ज़्यादा थी. अगर इस शहर का न होता तो शायद ज़्यादा इज़्ज़त मिलती, पर सब साले जानते थे कि जो कल तक बैक स्टेज पर समोसा और चाय लाता था वो ही आज सांस्कृतिक केंद्र का अधिकारी बन गया है. मैं गलियारे के बिलकुल बीच में चलता क्योकि बेंचों का मुझे लंगड़ी मार देने का खतरा था, ये खतरा तो कई चपरासियों से भी था पर वो दुबले थे और मैं मोटा. मोटा तो वो किनारे रखा घड़ा भी था जो न जाने कितनी बार मेरे रास्ते में आ चुका था. हर बार, हर दिन नए ताव पे तैयार मिलता. मैंने उसको कई बार रूककर-घूरकर समझाया, पर ऐंठबाज शहर तो घड़ा क्यों सीधा रहता. बड़ी मुश्किल सी हो गयी थी, जिसको भी काम बोलो वो 'हाँ' या 'जी' भी ऐसे बोलता जैसे कट्टे में आखिरी गोली भर रहा हो.
उस 'हाँ' या 'न' के  पीछे छुपी हिंसा को ध्यान में रखते हुए मैंने कभी भी ये नहीं कहा कि दिया हुआ काम कितनी देर में करना है, बस कट्टे में गोली भरने की आवाज़ को समझ लेता और इससे पहले कि फायर हो वापिस अपनी मेज पर पड़ी फाइलों में यूँ देखता जैसे उन फाइलों से गुप्त सुरंग मेरे घर के आँगन तक जा रही होगी. ऐसी सुरंग के बारे में कई बार सोचा और एहसास हुआ, अगर ऑफिस भूतल पर होता तो सुरंग खोद लेता पर पहली मंज़िल पे सुरंग का ख्याल बड़ा ही बेवकूफी का है. सुरंग में आने-जाने से ट्रैफिक का बवाल बच जाता क्योंकि सुरंग की दीवारें, इतिहास गवाह रहा है कि हमेशा से सगी रही हैं, वरना घर, महल और ऑफिस की दीवारों ने बड़े-बड़े फ़साद करवा दिए, जितने भी राजा-महाराजा आज तक सुरक्षित बचे हैं वो सिर्फ इसलिए क्योंकि सुरंग की दीवारें, मेरे कमरे की बूढी दीवारों की तरह न तो पंचायत करतीं और न ही किसी की तस्वीर सीने पे टांग कर मुस्कुरातीं..
18 दिन पहले पदभार मिला, मौसम ठण्ड का, मैं मौसम का बहुत ध्यान रखता हूँ, आप कितनी भी पार्टी करिये अगले दिन खाना सड़ेगा नहीं, इसलिए पैदा भी ठण्ड में हुआ और शादी भी ठण्ड में की, इस शहर में ठण्ड में खाने का मज़ा कुछ और ही है और शायद इसीलिए इस शहर से दूर कभी जा भी नहीं पाया. और जब नौकरी सोची तब भी इसी शहर का ख्याल आया. अजीब शहर है ये लेकिन, अगर मैं उलटे कदम भी ऑफिस जाऊं तो शहर सही दिशा में ही चलता दिखेगा, इस छोटे से शहर के लोग भी बड़े जीवट और ढीठ. आप उलटे चलोगे तो ये रूककर-पीछे घूमकर, जब तक आपको आपके चमन चूतिये होने का एहसास न दिला दें तब तक मानेंगे नहीं
-अबे उलटे जा रहा हूँ जाने दो, तुमको क्या पड़ी है भई
पर ये साले ऐसे अज्जर हैं कि हाथ में घड़ी पहने रहेंगे तो भी सामने वाले से बात छेड़ने के लिए पूछ लेंगे
-आपकी घडी में क्या टाइम हो रहा है?
पूछने को तो ये भी पूछ सकते थे कि- क्या टाइम हुआ है?
पर नहीं What is the time by your watch का विशुद्ध हिंदी अनुवाद इनके जीवन की बोरियत का सहारा है
आप समय न बताइये तो-भैया टाइम बता दोगे तो क्या घिस जाओगे ?
आप समय बता दीजिये तो-नहीं यार ! हमारी घडी में कुछ और बज रहा है, आपकी फ़ास्ट तो नहीं है?
हाँ! मैं फ़ास्ट करके रखता हूँ जिस से कि समय से पीछे न होने पाऊं। जब भी समय सोचता कि उसमें आगे निकलने का दम है, मैं पहले से तैयार मिलता. समय पहुँचता, रुकता फिर कुछ भद्दी सी गालियां बुदबुदाकार आगे भागता.
जीतने के नशे से ज़्यादा हराने का दम्भ मज़ा देता.
इसलिए जब बाप और चाचा बोले-एक्टिंग करोगे तो तिलक का थाल लेकर 'कोठा पारचा' के सिग्नल पर मूंगफली बेचनी पड़ेगी, अमिताभ बच्चन के बाप हरिवंश राय न होते तो ससुरे को आटे-दाल का भाव पता चलता.
मूंगफली कभी बादाम नहीं और दुनिया का हर एक्टर कभी अमिताभ बच्चन नहीं.
मैंने नाटक नहीं छोड़ा पर अक्सर ही मूंगफली बेचने वाले से मूंगफली खरीदते समय पूछ ही लेता-एक्टर बनोगे ?
वो पेपर के कोन को खोलते-खोलते, उसमें मूंगफली भरते-भरते हंस देता. उसके दोहरा-तम्बाकू के बारीक कणों से भरे दांतों के बीच से भूरी-काली ज़बान कुछ बोलने को बाहर आती पर पैसे हाथ में देते ही अंदर चली जाती और फिर से दाँतों के बीच में फंसे तम्बाकू के टुकड़ों को खोदने में लग जाती. मूंगफली वाली ज़बान को तो फिर भी कुछ काम था पर मेरे बाप और चाचा सुबह-सुबह ब्रश ही इसीलिए करते क्योंकि उनको दुनिया के ऊपर हिंदी के सभी मुहावरों का प्रयोग करना होता था.
कुछ बिना क्रम के :
⇉ नाच न आवे आँगन टेढ़ा.
⇉ जो साले ​98% से कम नंबर लाएं सबको फेल कर देना चाहिए.
⇉ हमको न सिखाओ हमने ऊँगली से बच्चे नहीं पैदा किये हैं.

एक्टिंग करना बेहतर था, उनको जवाब देने से, पर दोनों साले रोज़ नए चक्रव्यूह रचते और मैं हर दांव से आगे, क्योंकि समय से आगे रहना मेरा शौक था.
मेरे शो के दिन साइकिल का टायर भद्द सा सोया मिलता पर मैं आज तक नहीं भकभकाया, लगा रहा देबू दा  के साथ, बड़े गजब के इंसान थे दुबे दा. जब पहली बार मिला, वो बेंच पर बैठे कई बच्चों को ये समझा रहे थे
- देखो ! तुम सब थिएटर करना चाहते हो की एक्टर बनना ?
इस अजीब सवाल का जवाब आप किसी भी रूप में दे दीजिये, देबू दा अपने पुराने सवाल पे आ जाते
देबू दा: दादा साहब फाल्के का पूरा नाम बताओ ?
-देबू दा, प्यार से पूरा देश उनको दादा साब ही बुलाता है...
देबू दा: हमने सवाल देश से पूछा है कि तुमसे ?
-श्री दादा साहब फाल्के
देबू दा: दो पड़ाका मारेंगे लोट जाओगे हमको लपझट समझ रखा है? जाओ, निकलो नहीं होगी रिहर्सल. बनना है हीरो पर सिनेमा के बाप का नाम नहीं जानते. अम्मा से पूछ आओ, अपने बाप का नाम भी पता है कि नहीं ! ! !
ऐसे ही जब मन आता गरियाते, जब मन होता रिहर्सल करवाते​.  ​
जिसको रहना हो रहे और जिसको जाना हो चला जाये. उनको आज तक फ़र्क़ नहीं पड़ा. उनके साथ कार्यशाला में काम करने का लालच हर किसी को था और बड़े नाटक को उस जीवंतता के साथ अगर किसी में करने का दम रतन थियम के बाद था तो वो देबू दा  थे. ऐसा नाटक जमाते कि दर्शक बंध जाते. जो पैसा जुगाड़ कर लाते सब लगा देते. किस-किस कोने से सरकारी अनुदान निकाल लाते, प्रायोजक ढूँढ़ लाते किसी के पल्ले नहीं पड़ता.
'दुबे दा' तदभव रूप में 'दुबेदा', फिर उसे हर थिएटर में कदम रखने वाली पीढ़ी ने अपनी तरह से अलंकृत किया, जब मैं शहर छोड़कर गया था उनका नाम 'दुबेदा जी' था और अब जब लौट हूँ तो 'सर वेदाजी' हो गया है.
पूरा विश्वास है कि अगर यूँ ही शहर में कार्यशाला करवाते रहे 'सर्वेजी' या 'सरदाजी' भी हो जायेगा, पर ऐसा होने में अभी कई दशक बीतने थे और जितने दशक बीत चुके थे उसका शायद ही कोई असर मेरे..... मैंने सोच लिया है, मैं देबू दा  ही बोलूंगा। देबू दा  ने हमेशा से मुझे थिएटर से भगाने की कोशिश की पर मुझे उनको भी हराना था।  हराना मेरी चारित्रिक मजबूरी का सौंदर्य बोध था.
देबू दा  भगाते और मैं रुंआसा लौट आता उनका दोहरा गुटका बंधवाये. देबू दा की सुबह, ब्रश करने से पहले मसाला और फिर दांतों के बीच से मलवा निकालने का संतोष, चाय नहाकर पीना और नाश्ते में मटर की कचौड़ी, अरहर की दाल के साथ खाना है, इतना सुनिश्चित जैसे चम्पक की कहानियों में चीकू खरगोश का नाम चीकू। और इस नाम को बदलने के डर से तो रुडयार्ड किपलिंग ने जंगल बुक में खरगोश के चरित्र को लिखा ही नहीं. खैर मटर या आलू की कचौड़ी के साथ अरहर की दाल का शौक सिर्फ देबू दा को था. पर थे कमाल के एक्टर जिस नाटक पर बैठ जाएँ उसमें अपने ही नहीं सारे किरदारों के संवाद याद कर लेते. शो के दिन ऐसी एक्टिंग करते कि दर्शक बीच शो में ही तालियां पीटने लगते. इन ताली पीटने वालों को मैं हमेशा से ही शक़ की निगाह से देखता आया. बड़े भोथर किस्म के लोग होते हैं, उनके लिए नाटक समझ आने का मापदंड तालियां है. स्टेज पर एक्टर सबसे संजीदा सीन भी करेगा तो ये साले अवाक् रह जाने का भाव भी तालियों से प्रस्तुत करते. कई बार बैक स्टेज से उन चूतियों को ताड़ता रहता कि आखिर सीन के बीच में ताली शुरू किसने की. अगर मैं उनको ढूंढ़ भी लेता तो पीटने का प्लान  स्थगित कर देता क्योंकि शो के बाद देबू दा उसी शख्स के साथ शरीर का हर एक अंग हिलाहिलाकर कर हंस रहे होते. पहले शक़ था पर जब देबू दा को शो और परफॉरमेंस के नाम पर पैसे लेते देखा तो यकीं हो गया कि तालियों और देबू दा में सेटिंग है. उन पैसों से देबू दा ने, न कार खरीदी और न घर बाँधा पर वो सबके लिए बेहतरीन दारू और खाने का इंतज़ाम कर लाते.
बेहतरीन बहुत ही भ्रामक शब्द है इसका अहसास देबू दा द्वारा लाई गई दारू को देखकर किसी भी भाषाविद् को हो जाता.
पर देबू दा किसी भी तरह की दारू के नशे में अपने अब तक के सभी नाटकों का अजीब खिचड़ी परफॉरमेंस देते, कुछ ऐसा-

​"​उमंगो भरी उम्र है, पूरे आलम को फ़तह करने के ख़्वाब देखने की उम्र है मैं भी जब पहली मर्तबा दौलताबाद आया था तो ये गीत सुनते ही आँखों के आगे छा जाती है विलेज लाइफ, देहात की ज़िन्दगी झुटपुटा मीठी-मीठी ऊँघ और हमें गोद में लिटाये माँ, सब समाप्त हो गया कुचले हुए सांप सा.... जैसा है मेरा मन, वन में इस भयानक वन में भूल नहीं पाता हूँ कि कितनी बार कहा है भैया विलोम ज़्यादा ऊंचे मत चढ़ा करो. भीगे दिनों में फिसलकर गिरे और गिरे खाई में. याद है आपको याद है? जब पिछली बार हमारी भेंट हुई थी तो ठीक यही बात उस समय भी मैंने कही थी. बरहराल इस गणित की पहेली में कुछ नहीं रखा, बात इतनी है कि विभाजित होकर मैं आप में से हर एक व्यक्ति हूँ."​
   

देबू दा जब तक बोलते तभी तक पीते भी थे, पीना ख़तम होने तक बोलते थे पर पूरी दारु वो कभी नहीं पी पाए क्योंकि दारू की बोतल खाली होती थी पर उसमें दारू की जगह हमेशा बनी रहती थी. कई बार सोचा कि मैं भी पी लूँ पर देबू दा को सँभालने में ही सारी शाम निकल जाती. उनके पीने के तरीके में चखना, दारू, बीड़ी, खाना और उलटी का एक सिलसिला था. दारू, चखना और खाना आपस में क्रम बदल सकते थे पर उलटी हमेशा दरवाजे के बाहर दबे पाँव खड़े रहती और तभी आती जब देबू दा मुंह फाड़-फाड़कर उसे आवाज़ देते. हर चीज़ पर ऐसा नियंत्रण देबू दा की खासियत थी, ऐसा नियंत्रण उनका स्टेज पर भी था, अगर वो खुद स्टेज पर हैं और शो चल रहा है तो अब ये उनके मन पे था कि कब अगला एक्टर घुसेगा. जब तक उनका मन होता वो किरदार की आवाज़ बंद नहीं होने देते, नाटककार ने क्या लिखा है इससे देबू दा का सम्बन्ध सिर्फ रिहर्सल तक होता, शो के दिन अपने मन से लाइनें बड़बड़ाते रहते जब तक थक न जाते या जब तक दर्शकों से तालियां न बजवा लेते. अगला अभिनेता नेपथ्य में खड़ा गालियाँ बकता रह जाता क्योंकि जब तक देबू दा थकते, नाटक के आगे बढ़ने का कोई मतलब नहीं था. कई बार तो दूसरे अंक में इतनी तालियां बजवा लीं कि दर्शक उठ खड़े हुए और मैं बैक स्टेज से उद्घोषणा करता रह गया कि अभी तीन अंक बाकी हैं. उधर देबू दा दर्शक दीर्घा में उतर चुके थे, सबने कई बार सोचा कि इनके साथ अगली बार न कार्यशाला करेंगे, न ही कोई नाटक पर अगर किसी ने बहस करने की कोशिश की भी तो बड़े ही प्रबल शब्दों में शुरुआत करते अपनी बातों की, 'शे' और 'कास्त्रो' का नाम तो ऐसे लेते जैसे उनके साथ हर खिचड़ी (मकर संक्रांति) पतंग उड़ाई हो.
​न खिचड़ी पे पतंग, न होली पे रंग, न दिवाली पे पटाखे, बस आये दिन उपवास रखते और अक्सर दारू और बीड़ी की प्रतियोगिता करवाते, अकेले जो रहते थे. अकेले रहना उनकी किस्मत में ही रहा होगा, वरना इतनी सुन्दर बीवी छोड़कर नहीं चली जाती. उनकी बीवी को शायद ही किसी ने देखा होगा पर उपमा अलंकार का प्रयोग सबको आता था और जिसने जैसे दुनिए देखी वैसी परिकल्पना : मधुबाला, क्लेओपेट्रा, मर्लिन मुनरो, शकुंतला इत्यादि याद किये गए. उनकी  बीवी को मैंने भी नहीं देखा था पर सुना है कि हाई कोर्ट के जज की लड़की थी, सुंदरता की तुलना में श्रीदेवी और ऐश्वर्या राय भी शामिल थीं. जब कार से उतरती तो कभी भी अपनी नज़र ऊपर नहीं करती, किस से आँखें मिल जाएँ और वो इसको मौन स्वीकृति मान ले. ​
शहर में कइयों ने कइयों को कइयों के कहने पर कट्टे सटा दिए. गणना मुश्किल थी कि शहर के मर्दों में उनके देवर ज्यादा थे कि जेठ, पति तो लगभग सभी थे, उनके पिता और भाई को छोड़कर. पुलिस भी मनाती कि, इसकी शादी हो जाए और ये शहर से जाये वरना जज की लड़की के पीछे आये दिन बवाल, पर जिस दिन उसने देबू दा से शादी की उस दिन पुलिस को ज़रुरत से ज़्यादा तकलीफ हुई. सारा दिन जज साब खुद पुलिस लेकर अपनी लड़की ढूंढते रहे. कई पेण्टर, थिएटर करने वाले और समाज सेवी निपट गए, कुछ गांजा पीते पकडे गए तो कुछ मलिन बस्ती में नुक्कड़ नाटक करते हुए, पर पकडे वो भी गए जिनकी अम्मा ने पिछले साल, लाल रंग के ऊन से स्वेटर बुन दिया था. इस दौरान एक सब्जीवाला भी पकड़ा गया जो लाल गाजरों से भरे ठेले पर सोया था. उस दिन शहर में कोई सिग्नल लाल नहीं हुआ पुलिस के लिए.
वैसे ये सब मैंने देखा नहीं सिर्फ सुना है क्योंकि जब मैं देबू दा से मिला वो अकेले ही रहते थे अपने कमरे (कमरेनुमा घर) में, वहाँ घुसना निषिद्ध था.
निषिद्ध नहीं भी होता तो भी किसी के लिए उनके घर में झांकना असंभव था. छत जैसे हड़प्पा-मोहनजोदारो की खुदाई में निकली थी, पूरी छत के चारों तरफ 10 फुट ऊंची दीवार थी. जिसके अंदर अनुमानतः 100-200  किरमिच (कैनवस) की गेंदें और कम से कम 270-271 पतंगें कट के गिरी होंगी. संख्या में इतनी सूक्ष्मता क्योंकि इस साल मकर संक्रांति के पहले तक देबू दा 250 पतंगें बोलते थे पर मकर संक्रांति पर लगभग 20-21 पतंग लूटने वाले लड़कों से उनकी लड़ाई हुई थी. मकर संक्रांति के आसपास कभी सूर्य ग्रहण नहीं लगता पर सुना है 127 साल बाद ये घटना घट रही थी. उस दिन ग्रहण लगा था और देबू दा ने निर्णय लिया था कि जब तक ग्रहण लगा है रिहर्सल नहीं होगी. ग्रहण का ही असर रहा होगा कि मैंने उनको सलाह दे डाली-देबू दा गेंदें और पतंगें आपको हम सबमें बाँट देनी चाहिए, रिहर्सल तो आपकी छत पे भी की जा सकती है. देबू दा शायद इस बात पे उतना ध्यान नहीं देते पर ग्रहण के सूरज की रोशनी कम हो रही थी जब मैंने बात ख़त्म की, नाटक के सभी साथी मुस्कुराये, छत की खुदाई के लिए अपनी दांतों की कुदाल निकाल ली जैसे छत पर पहुंचकर राखालदास बनर्जी खुद माल्यार्पण करके इन सबका स्वागत करेंगे. ये ज़रूर है कि अगर मैं छत में घुसने में कामयाब हो जाता तो राखालदास बनर्जी द्वारा की गयी मोहनजोदारो की खुदाई से कम श्रेय मुझे न मिलता. पर मिला क्या?
'कोर्ट मार्शल' नाटक में जो एक सिपाही का किरदार मिला था वो भी देबू दा ने ये समझाते हुए कि-'अगर करना ही है तो रामचंद्र का रोल करना, सिपाही बनने में क्या है' वापस बैक स्टेज पर चाय की केतली और समोसे का पैकेट थमा दिया, अगर मेरे बाप-चाचा मूंगफली की जगह चाय-समोसा बोलते तो वो जीत जाते. पर चाय, समोसा और जलेबी हीरा हलवाई बेचता था मैं नहीं.
मैंने भी सोच लिया था कि 10 नाटकों का प्रमाण पत्र मिल जाये तो 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' की परीक्षा में बैठ जाऊं. देबू दा क्या चाहते थे, ये समझ के बाहर था. 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' से पढाई करके वापस शहर आ गए थे, न मुम्बई गए और न दिल्ली में रहे. न घर, न बच्चे, किरायेदारों से किराया मिल जाता और छत तो उनकी थी ही. देबू दा ने जो नाटक लिखा अगर स्टेज पर आ गया तो इतिहास, बवाल, फट, ग़दर ऐसा बहुत कुछ हो जायेगा. वो नाटक गंगा किनारे अकबर के किले पर होगा, दर्शक नाव में बैठकर नाटक देखेंगे, यहाँ तक शायद सच रहा होगा क्योंकि देबू दा ऐसा सोच सकते हैं पर उसके बाद जो भी सुना वो निश्चित ही इस शहर की मनुष्य प्रजाति का दिमागी गुब्बारा था. कुछ कलाकार तो नदी के उस पर से संवाद बोलते हुए, नदी में कूद जायेंगे फिर तैरते हुए आएंगे, घोड़े किले के ऊपर से कूदेंगे.
नाटक का बजट बहुत बड़ा था पर देबू दा ने सोच रखा था कि वो नाटक करना है. मैंने कई बार बोला-दुबे दा, एक बार वो नाटक की रीडिंग करवाइये न !
उस दिन उन्होंने समझाया-'अ' श्रेणी के इंसान को हमेशा 'अ' श्रेणी के इंसान के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने चाहिए, 'अ' श्रेणी की किताबें पढ़नी चाहिए और उसी श्रेणी का खाना भी खाना चाहिए.
फिर मेरे कंधे पे हाथ रखकर बोले- 'वतन के रखवाले' फिल्म देखी ? देख लो एक्टिंग सीखनी है तो.
बहुत बुरा लगा और मैंने 'वतन के रखवाले' की जगह 'संसार' पिक्चर देख ली
देबू दा को वो भी पता चल गया, थोड़ा मुस्कुराये-जब दो 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' वालों से एक्टिंग सीख ली तो अब क्या बचा है इस शहर में सीखने को, आगे निकलो, क्यों शहर में ज़िन्दगी ख़राब आकर रहे हो.
फिर बहुत देर तक वो बहुत कुछ बोलते रहे जिसका भावार्थ यही सिद्ध करता रहा कि मेरा अपमान करने का हक़ देबू दा को ऊपर वाले ने दिया है.
देबू दा का अहंकार बड़ा विचित्र था पर मुझे हारना नहीं था, वहां से निकलते वक़्त उनके पैर छुए और उन्होंने भी बड़े प्यार से सीने से लगाकर आशीर्वाद दिया, उनको शायद लग चुका था कि मैं अब वापस नहीं आऊंगा.
उनके यहाँ से बैक स्टेज छोड़कर पहले तो खुद को विश्वास नहीं हुआ, पर जब एक नाटक लिख डाला तो मेरे पिचके हुए आत्मविश्वास में बहुत हवा भर गयी. शहर जानता था कि मैं देबू दा स्कूल का छात्र हूँ, इसलिए छोटे-मोटे नाटक खड़ा करने में पैसा मिलना मुश्किल नहीं हुआ. उस नाटक में मैंने खुद निर्देशन किया, प्रकाश संयोजन और संगीत भी खुद ही दिया.
उस नाटक के बाद मैं कभी भी देबू दा से नहीं मिला और ये भी समझ आ गया कि देबू दा कला के नाम पर कुछ ज़्यादा ही घमंडी थे वरना नाटक तो मैंने भी किया प्रायोजक भी मिल गए. सिर्फ़ अपने को कलाकार समझना और बाकियों को उल्लू, दिल्ली में या मुम्बई में भी उल्लुओं को कमी नहीं होगी पर मुझे क्या करना था. दिल्ली पहुंचकर 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' में प्रवेश लेना था. कई साल कोशिश की फिर समझ आ गया कि इस 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' में भी एक नहीं, साले 8-10 देबू दा बैठे हैं, खुद बहुत बड़े एक्टर थे तो यहाँ पढ़ा क्यों रहे हो, पर मेरा प्रवेश नहीं लिया तो नहीं. आखिरी बार तो मैं रो पड़ा साक्षात्कार के बाद, सच्चाई का एहसास जल्दी हो गया और उधर मेरा छोटा भाई बैंक पीओ की परीक्षा में सफल हो गया था. करा उसने- भरा मैंने, फिर तो दिन रात पढाई की और सच बता रहा हूँ कि नाटक करना क्या, देखना भी छोड़ दिया.
कइयों ने कहा जब सरकारी नौकरी की परीक्षा ही देनी है शहर आ जाना चाहिए पर हराने का दम्भ पाला था. ऐसा नहीं है कि मैं बीच में कभी शहर वापस नहीं गया पर कभी किसी को पता नहीं चलने दिया, छोटे भाई ने आश्वाशन दे दिया था कि जब तक मेरी नौकरी नहीं लग जाती और मेरी शादी तय नहीं हो जाती वो 'गर्लफ्रेंड' नमक सर्वनाम से काम चलाएगा.
पिछली बार गया था लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, मौका देखकर मेरे बाप ने मेरे चाचा के कहने पर मेरे चाचा के ससुराल में एक लड़की देखकर शादी तय करवा दी. मेरे बाप का मानना था कि अगर इंटरव्यू तक रुक जाते तो शायद रिश्ता और बढ़िया मिल जाता. बढ़िया का मतलब पैसों से था, लड़की सिर्फ वही सही होती है इन बूढ़ों के लिए जो बच्चा जन सके बाकि उनका किसी चीज़ से मतलब नहीं था. जब भी शहर जाता अपनी ज़िद में कभी भी देबू दा से मिलने नहीं गया. कइयों से पता करता रहा उनके बारे में और बस यही पता चला कि अब तक देबू दा को उस गंगा किनारे वाले नाटक के लिए कहीं से भी पैसे या प्रायोजक नहीं मिले, उल्टा अब तो उनके यहाँ कार्यशाला में आने वाले लड़के भी बहुत कम हो गए हैं. देबू दा ने शायद पिछले 5 सालों में एक भी नाटक किया होगा पर वो अभी भी उस नाटक तो लेकर काफी उत्साहित रहते हैं, ये सब सुना ही है क्योंकि मेरे हिसाब से तो देबू दा को अब कोई नहीं पूछता.
अब जब मुझे नौकरी मिल चुकी थी वो भी उसी शहर के सांस्कृतिक केंद्र में जहाँ पर एक शो लगवाने के लिए लोगों की घिस जाती थी. मेरे साले के साढू के पापा ज़िन्दगी भर राज्यमंत्री रहे थे, वो भी शायद कैबिनेट मंत्री बन जाते पर उनके अंदर भी देबू दा बैठे थे, एक दिन एक गांव में थे और प्रेस के सामने एक दलित के हाथों खाना लेने से मना कर दिया था, सबने भरसक समझाया कि घर जाकर डेटॉल से कुल्ला कर लेना पर वो नहीं माने तो नहीं. फिर भी आज ट्रांसफर इत्यादि करवा सकते थे.
उनकी कृपा थी और मुझे अपने ही शहर में एक ऐसा पद मिल गया जिसको पाने के लिए कोई मरा नहीं जा रहा था.
मेरे जीवन का उल्लेख न तो विस्मरणीय है और न ही ये सब बताकर इस कहानी का कोई फायदा होना है, जितना बताना था उतना बता दिया.
पर जब​ ​से पद संभाला मेरा बहुत मन कर रहा था कि देबू दा से एक बार जाकर मिलूं. अक्सर उनके घर के पास से गुज़रा, रास्ता उधर से नहीं जाता था फिर भी कार उधर घुमा ली, सोचा कि अगर दिख गए तो नमस्ते बोल दूंगा पर खुद मिलने नहीं जाऊँगा.
अब तो अक्सर ही उस रास्ते से जानबूझकर गुजरता और जब-जब उस रास्ते पर होता मुझे वो सारी बातें बारीकी से ध्यान में आने लगतीं. मुझे देबू दा की बुराइयां साफ़ साफ़ दिखने लगी थी. जिस बात पर मैंने आज तक ध्यान नहीं दिया था वो भी मुझे याद आने लगी थीं, जैसे-उन्होंने अन्य कलाकारों को कभी न कभी कुछ पैसे दिए भी थे पर मुझे आज तक एक चवन्नी भी नहीं थमाई थी, हमेशा मज़दूर की तरह काम करवाया, कभी एक रोल भी नहीं दिया, मैंने उनके लिए कभी बुरा नहीं सोचा पर शायद अच्छा कलाकार और एक अच्छा इंसान दो बहुत अलग चीज़ें थीं. मैं शायद अच्छा कलाकार नहीं था पर इंसान......
मैंने अपने एक पुराने दोस्त को एक दिन ऑफिस बुलवा लिया, जितनी जल्दी वो आ गया उसको देखकर, उसके इतनी जल्दी आने के कई कारण हो सकते थे:
उसके बैंक में कोई काम नहीं था, उसे मेरे साथ बैठकर खुराफात करनी थी या फिर उसे भी किसी नाटक के लिए अनुदान चाहिए था. मैंने सिर्फ देबू दा बोला और उसने पलट के पहला सवाल पूछा-तुमने देबू दा को कुछ पैसे तो नहीं थमा दिए
मुझे अपना पद याद आ गया-उल्लू समझे हो? कहाँ बैठा हूँ देख नहीं रहे?
इस से आगे की बातें करने के लिए मैं उसे ऑफिस के बहार मुख्य सड़क पे ले आया, चाय- बिस्कुट के बहाने. उसने फिर बहुत लंबी बातचीत की और ट्रैफिक का शोर, चायवाले के स्टोव का शोर, रिक्शेवालों की घंटियों के बीच भी सब कुछ ठीक से सुनाई दे जाता पर इतना कुछ दिमाग में घूम रहा था कि - सठिया, कोर्ट केस, मकान, पतंग, गेंद, बीवी, रंडी, ठडक, अद्धा, पौवा, भीख, उधार, चूतिया, मेहनत की कमाई, जज, फाइल, सांस्कृतिक केंद्र, दसों चक्कर ही सुनाई पड़ा.
वो दोस्त शायद बहुत देर तक लगातार बोला होगा और मैंने उसके अर्द्धविरामों को 'हूँ-हाँ' से भरा था.
मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी देबू दा के उस नाटक का क्या हुआ? कभी किया कि नहीं? उनको किसी ने अनुदान दिया कि नहीं? अगर मैं बता दूं कि अब मेरे हाथ में है उनके नाटक का अनुदान स्वीकार करना तो क्या वो आकर माफ़ी मांगेंगे?
मैं तो बोल दूंगा कि अगर आपको एहसास हो गया है तो वही बहुत है.
-बोलने को तो वो भी बोल सकते हैं कि भूल जाओ 'लेखक' जिस समय तुम मेरे साथ काम कर रहे थे मेरी ज़िम्मेदारी थी तुम्हें सिखाने की इसलिए हमेशा सख्ती से पेश आता था.
-सख्ती तो ठीक है पर इस तरह बेइज़्ज़ती करना-'वतन के रखवाले' देख आओ. इस बात का क्या मतलब था ?
-तो क्या बोलता, वैसे भी उस समय ऐसी ही फिल्में आती थीं.
-पर आपने वो रोल क्यों छीन लिया
-अब तुम हुज्जत पे उतर रहे हो, मुझे लगा तुमसे अच्छा कोई कर सकता है तो दे दिया. वैसे भी तुम प्रशासन में अच्छे थे, बैक स्टेज में और आज देखो तुम वही काम अच्छा कर रहे हो
-मतलब आपको पता था कि मैं एक्टिंग नहीं कर पाऊंगा?
-क्या तुम नाटक का अनुदान दिलवा पाओगे ?
-मुझे पता था कि...
-क्या पता था ?
-'कर्मा' देबू दा 'कर्मा', सब घूमकर वहीँ आते हैं.
दोस्त वहीँ बैठा रहा और मुझे देखता रहा और फिर अपने आप शुरू हो गया
- किरायेदारों ने मकान के नीचे वाले हिस्से पे कब्ज़ा कर लिया था और देबू दा कोर्ट केस लड़ रहे थे. उसी छत के एक कमरे में रहते थे. चले जाओ लगता है तुमको बहुत याद आ रही है उनकी? ले चलें क्या तुमको?
वो अजीब तरीके से हंस-हंसकर बोल रहा था जो मुझे अच्छा नहीं लगा और मैंने उसे ऑफिस से जाने को बोल दिया मुझे लगा था कि शायद उसे बुरा लगेगा पर उसे बुरा नहीं लगा, मैं सरकारी ऑफिस में बैठा था इसलिए, वो हँसता हुआ ही गया और वापस मिलने का वादा करके. उसके जाते ही मैंने अलमारी से देबू दा की फाइल निकाली और निर्णय लिया कि आज ये नाटक पढ़कर ही घर जाऊँगा. मैंने तुरंत ही पढ़ना शुरू कर दिया और रात साढ़े दस बजे तक लगातार पढता रहा, शायद दो बार पढ़ गया होऊंगा.
क्या विस्तार था, ऐतिहासिक पर प्रासंगिक भी, हिन्दू की भी जलती और मुसलमान की भी. अकबर की ज़िन्दगी को ऐसा घुस के निकाला था कि 'मनु शर्मा' इस नाटक तो पढ़ते ही 'अकबर की आत्मकथा' लिखने बैठ जाते. इतनी निर्भीक सोच पर मुझे भी लग गया कि अगर ये नाटक मैं करवा देता हूँ तो निश्चित तौर पर बहुत नाम होगा.
मैंने अपने चपरासी से बोला कि वो देबू दा को बुला लाये पर ये न बताये की मैंने बुलाया है बस इतना बोल दे कि सांस्कृतिक केंद्र के कार्यकारी अधिकारी ने बुलाया है.
मुझे लगा था कि देबू दा दौड़ते हुए आएंगे पर उन्होंने कहला भेजा कि दो दिन बाद आ पाएंगे. मैं भी सोच लिया था कि अब तो स्क्रिप्ट में बदलाव करवा के रहूँगा, सामने से बुलाया जा रहा है और उस पर...
अगले दो दिन मैं दिन भर सारे 'क्रमचय व सम्मुचय' लगता रहा कि अगर वो ये बोले तो मैं उनको वो बोल दूंगा, कभी खुद ही नम्र पड़ जाता तो कभी खुद थोड़ा आक्रामक. धीरे-धीरे दो दिन भी बीत गए और पता चला कि दो दिन बीतने में दो दिन ही नहीं लगते कभी कभी ज़्यादा भी लग जाते हैं. इस बार दो दिन बीतने में आठ दिन लग गए पर देबू दा नहीं आये, मैं बहुत चिढा बैठा था और इस चक्कर में ऑफिस का काम भी ठीक से नहीं कर पा रहा था. मन ही मन उनसे मुलाक़ात और लड़ाई का ताना-बाना और ज़्यादा जटिल हो गया, मैं तो अब उनको कुर्सी पर भी बैठने नहीं दे रहा था. मेरे चलते लाखों-लाखों का अनुदान मिल सकता था पर उन्हें तो पता नहीं​ है ​
​कि मैंने बुलाया है फिर क्यों नहीं आये. मतलब उन्हें सांस्कृतिक अधिकारी की पद की भी गरिमा नहीं है? मतलब सरकार पागल है जो इतने इम्तहान लेती है और फिर चयनित करती है, इतने पढ़े-लिखे लोगों को...पहले राजा-महाराजा अपने राज्य के कलाकारों को वजीफा देते थे जिससे कि वो अपनी कला का रियाज़ कर सकें. वही परंपरा तो है, हमें अच्छे कलाकारों को पालना होगा उनको प्रश्रय देना होगा, देबू दा अच्छे नहीं बेहतरीन कलाकार हैं और मैं अब खुद उनको जाकर मिलूंगा.
ऑफिस और दोस्त को बोलकर रखा था कि पता करें कि वो घर के बाहर कहाँ मिलेंगे, बोल दिया था कि ऑफिस कार्यकाल के समय में ही मिलना चाहूँगा. घर जाने से डर ही लगता था, अगर घुसने भी दे दिया तो कहीं अकेला पाकर इज़्ज़त न उतार दें.
मैंने उनके घर की तरफ से आना बंद कर दिया था रास्ता लंबा ही पड़ता था.
एक दिन बैंक वाले दोस्त ने बताया कि अगर देबू दा को देखना है तो सिविल लाइन्स में उस इडली-सांभर वाले की दुकान पर चले जाओ दिख जायेंगे. इडली-सांभर की दुकान और उसके आस पास कलाकारों और बुद्धिजीवियों का जमघट सालों से रहता आया है.
मैं कार न लेकर जानबूझकर एक रिक्शे पे बैठ कर गया जिससे कि मैं छुपकर दूर से उन्हें  देख सकूं. ​रिक्शेवाले से बोल दिया था कि पांच सौ मीटर पहले हो रोक लेना.
मैं चुपचाप हाथ में चुरमुरा लिए धीमे-धीमे इडली सांभर की दुकान की तरफ चलने लगा. मैं नहीं चाहता था कि देबू दा मुझे देखें या पहचानें. देबू दा पेड़ के नीचे आधा खड़े और आधा बैठे हुए से थे और बड़ी ही बुलंद आवाज़ में कुछ बोले जा रहे थे, मुझे लगा शायद चुनाव की तैयारी में हैं पर जैसे-जैसे पास चलता गया वो आवाज़ सम्राट अकबर के चरित्र में बदलती गयी. दाढ़ी से चेहरा भरा हुआ था, कपडे भी लस्त-पस्त ही थे. पर देबू दा के चेहरे में एक चमकीला रुआब था, पेड़ की टहनी को लेकर जब हवा में हाथ ऊपर करते तो लगता जैसे शमशीर हवा में लहरा रही हो. इतना सम्मोहक  अभिनय कि चाटवाला गरम तेल में टिक्की नहीं डाल रहा, इडली कुकर में पड़ी थी, कुकर की सीटी उछली पर बिना आवाज़ भाप निकल गयी, सड़क पे किसी ने हॉर्न नहीं बजाया. देबू दा ने पेड़ की छनती रोशनी को ही स्टेज की लाइट मान लिया था, जब कोई ख़ास भाव देना होता तो उस लाइट में आ जाते और फिर घूमकर फुटपाथ को अपना स्टेज बना देते. किनारे खड़े दो ऑटो रिक्शा के बीच उनका नेपथ्य था, किसी ने नाटक के बीच में ताली नहीं बजाई पर जैसे ही अकबर अपने सिंहासन (साइकिल रिक्शा) पे बैठकर फूट-फूटकर रोता है, नाटक समाप्त, लोग तालियां बजाये जा रहे थे, और अचानक से वापस सड़क का शोर प्रभावी हो गया. किसी ने दौड़कर एक कुर्सी लगा दी, देबू दा  थककर बैठ गए थे, भुट्टे की रेहड़ी वाले ने देबू दा को भुट्टा सेंक कर दिया तो इडली वाले ने एक प्लेट डोसा​, चाटवाला करेला दही ले आया. ​मैं वहीँ पास में एक पेड़ के नीचे खड़ा था और उम्मीद में था कि शायद देबू दा  की नज़र जाएगी और मैं आगे बढ़कर मिल लूँगा पर देबू दा बहुत आत्मीयता से सबके साथ खा रहे थे और बातचीत कर रहे थे, प्रस्तुति के बाद अभिनेता को दर्शकों का प्यार से बड़ा नशा क्या होगा. देबू दा ने बहुत शौक से खाया. कई बार मन किया कि आगे बढ़कर देबू दा को नमस्ते बोल दूं पर तब तक देबू दा जा चुके थे, नहीं देबू दा तो बहुत पहले ही जा चुके थे. और कुछ लोग मुझे घूमकर देख रहे थे क्योंकि मैं बड़ी देर से मंत्रमुग्ध तालियां बजा रहा था.

Tuesday, December 06, 2016

दिल से -1998


1997 की बात है, 10+2 किए 3 साल बीत चुके थे, और सवाल बड़े होते जा रहे थे कि अब क्या करना है ? क्या सोचा है आगे के बारे में ? खाली बैठे हो PCS की तैयारी क्यों नहीं कर लेते. मैंने ये तो निश्चय कर लिया था कि इंजीनियर, डॉक्टर या IAS अफसर नहीं बनना है पर क्या बनना है ये पता नहीं था. जिनका लड़का या लड़की इंजीनियरिंग में select हो गए थे उनके सर पर कलगी उग आयी थी और उनको लगने लगा था कि हम जैसों को नसीहत देनी उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी है. सलाहों से बचने का रास्ता एक ही था कि कोई ऐसा दोस्त मिल जाए जो मेरे साथ बैठकर इन सबको गाली दे सकें क्योंकि गाली अकेले देने में मज़ा नहीं आता और कोई साथ देता है तो विश्वास हो जाता है कि मैं गलत नहीं हूँ। मैं जिस कॉलोनी में रहता था वहीँ एक लड़का मिला मुझसे कुछ साल बड़ा रहा होगा पर कुछ अजीब सा था। और अजीब से लोगों में कुछ ज़रूर होता है।
उस से पूछा तो पता चला कि वो अपने आपको मक़बूल फ़िदा हुसैन से कम नहीं समझता था और उसको भी वो सब चूतिये लगते था जो State Engineering Test में 18000 से 52000 rank लेकर भी तन के चलते थे। मेरा और उसका मानना था की सालों को kidnap करके कूट-कूट के मारना चाहिए. मुझे विश्वास हो गया था कि अब मैं अकेले नहीं हूँ. पर उसको दोस्त बनाने से पहले मुझे उसके talent के बारे में विश्वस्त होना था। मैं उसके घर पहुंच गया और फिर उसके कमरे में उसकी बनाई हुई पेन्टिंग्स देखने के लिए. मैं उसको अपने पर हावी नहीं होने देना चाहता था इसलिए कला को लेकर अपने विचारों को वाक्यों में बदल चुका था। पर पेन्टिंग्स देखते ही मैं समझ गया कि य लौंडा सच में योग्य है ,मेरे साथ मिलकर उन चूतियों को किडनैप करने के लिए. रोज़ शाम 2 -3 घण्टे उसी के घर पे कटते। वो पेन्टिंग बेचकर नहीं तो किसी के घर का interior करके पैसे कमा लेता था और मेरे पास ऐसा कोई हुनर नहीं था. पर उसको भी शायद मैं पसंद आ गया था इसलिए उसने कभी पैसों को बीच में नहीं आने दिया. बिना सोचे अपनी Hero Puch दे देता, अगर कभी उसे लगा कि मुझे कोई म्यूजिक सुनने का मन है तो कैसेट खरीद लाता। 1998 में "दिल से " रिलीज़ हुई, हम दोनों ने उस कैसेट को इतनी बार सुना कि अब तो बिना कैसेट डाले ही शायद टेप रिकॉर्डर वो गाना बजा देता. हम दोनों अपनी किस्मत को कोसते कि जाने किस शहर में पैदा हो गए जहाँ कला को समझने वाले मर चुके हैं. चूंकि मेरे पास पैसे नहीं होते थे इसलिए मैं म्यूजिक कैसेट का और उसी तरह के छुटपुट बहुत से एहसानों के अंदर दबा रहता पर उसने कभी बोला नहीं। अचानक एक दिन वो बोला - शादी कर रहा हूँ और लड़की घर से भगानी है. मुझे तो ऐसा लगा कि जैसे यही वो मौका है जब मैं अपने ऊपर लदे एहसानों को चुका सकता हूँ. मैंने नहीं पूछा कि लड़की कौन है या फिर अभी क्या जल्दी पड़ी है। सारे इंतेज़ाम करवा दिए. लड़की भगा ली गयी. कोर्ट में शादी हो गयी. लड़की के माँ-बाप ने पुलिस में शिकायत की पर उनको भी चकमा दिया गया. रात भर पुलिस उसको ढूंढती रही और उसका पूरा परिवार मेरे घर पे बैठा कॉफ़ी की चुस्कियां ले रहा था। शादी होते ही मैंने उसके घर जाना काम कर दिया पर जब भी मिलते "दिल से" ज़रूर सुनते और यही बोलते - ये लोग हैं जो जी रहे हैं ज़िन्दगी, हम चूतिये यहीं मर जायेंगे AR Rehman और Mani Ratnam की बात करते-करते.
समय बीता मैं किसी तरह MBA की पढाई करने उज्जैन पहुँच गया और और मैं शर्मिंदा था अपने सपनों के आगे इतना बौना साबित होने में या कहूँ कि उसी भीड़ का हिस्सा बनने पर जिसको मैंने हमेशा गाली दी थी कि मैंने उस दोस्त से बात करना या मिलना जुलना बंद कर दिया. मैंने हथियार डाल दिए थे ज़िन्दगी के सामने, पर किस्मत...
FTII का exam दिया और न जाने कैसे मेरा admission हो भी गया. साल बीते और एक दिन Institute में अपनी फिल्म के लिए एक art director की ज़रुरत आ पड़ी. मैंने बिना सोचे उसी दोस्त को फोन किया। उसके हिसाब से वो सिर्फ एक पेण्टर था, Art Direction उसके बस का नहीं था। मैंने ज़िद करके उस से कहा कि वो आ जाये बाकि काम मैं करा लूँगा. हम शायद २ साल बाद मिले. फिर से "दिल से" सुना गया और उसने एक नहीं 3-4 diploma फिल्मों पे काम किया.
और उसके बाद उसने कभी मुड़कर नहीं देखा। मुम्बई में Pebbles Prop House खोला, कई Godown खोले और बहुत सी फिल्में की । Slumdog Millionaire, The Life of Pai और ऐसी ही तमाम फिल्में। मैंने जब भी बोला उसने बिना कुछ पूछे मेरी Ad Films का art direction किया। हम लोगों ने बहुत दिनों से साथ बैठकर "दिल से" नहीं सुना.
आज उसका WhatsApp पर message आया - राहुल, रोम में हूँ। AR Rahman जो फिल्म direct कर रहा है उसका Art Direction कर रहा हूँ, recce पे हूँ.
अब "दिल से" सुन रहा हूँ अकेले बैठकर उस दोस्त के लिए जिसने आज भावुक कर दिया।

Monday, November 21, 2016

पापा कहते हैं -1996


हमारे शहर में, मैं इलाहाबाद की बात कर रहा हूँ, ऐसा कोई लौंडा नहीं होगा जिसने 15 से 18 साल के बीच कविता न लिखी हो. कविता कैसी भी हो पर करनी है और फिर बात-बात में कविता सुनाना इस उम्मीद में कब कोई लड़की पट जाए. हमारे शहर में लड़के-लड़कियां साथ नहीं पढ़ते थे और जिस स्कूल में पढ़ते थे वहां के बच्चे गाय का नहीं Cow का दूध पीते थे. हमने तो ज़िन्दगी भर भैंस का दूध पिया क्योंकि गाय के दूध से सस्ता होता था। पता नहीं क्यों काली भैंस और अपना रंग आईने में देखकर ये विश्वास हो चुका था कि दूध कितना भी सफ़ेद हो भैंस का, पर जिसका दूध इतने साल पियोगे उसी तरह के हो जाओगे. हम मोटे भी हैं और काले भी, जो नहीं मानते ये बात वो जाकर हृतिक रोशन से पूछ लें उसने बचपन से गाय का दूध ही पिया है कि नहीं . खैर कॉलोनी में जिस खम्भे से हमारा दूधवाला अपनी भैंसे शाम को बांधता था वहीँ पे घर था उनका। पहले तो मम्मी ही जाती थीं दूध लेने पर जब बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग में selection नहीं हुआ तो बी.कॉम. करते वक़्त दूध लाना बिलकुल सही सा लगता था। वो भी दूध लेने आती थी, बस हमको लगा कि ये जोड़ी ऊपर से बनकर आयी है अब दूध लेने में जो मज़ा आता कि, लगता कि हम और वो ही दूध लेने आएं और कोई न आये पर ऐसा होना संभव नहीं था। पर हमने सोच लिया था कि इस दैवीय जोड़ी को हम टूटने नहीं देंगे. उस से कोशिश की बात करने की तो पता चला कि वो भी कविता करती है और साथ ही साथ पेन्टिंग्स भी बनाती है। मैंने ऐसी रूचि दिखाई जैसे कि मेरा जन्म National Art Gallery में ही हुआ था।
पर उद्देश्य था प्यार का इज़हार करना वो भी डंके की चोट पे पर ऐसा रिस्क छोटे शहरों में भारी पड़ सकता था। बहुत दिमाग दौड़ाया और फिर मैंने कॉलोनी में बच्चों को ट्यूशन पढ़ानी शुरू कर दी क्योंकि पता था कि उसका एक छोटा भाई है जिसको मैं पढ़ा सकता हूँ.
जल्दी ही उसका भाई हमसे ट्यूशन पढ़ने लगा, न जाने क्यों ऐसा मेरे साथ ही होता था... "पापा कहते हैं" रिलीज़ हो गयी और साला गाना भी बड़ा सटीक। घर से निकलते ही , कुछ दूर चलते ही , रस्ते में है उसका घर....
ऐसा लगा जैसे की हमारी ज़िन्दगी बहुत लोगों को प्रेरणा दे रही थी। निर्णय हो गया कि इस से पहले कि वो हमको बुजदिल समझे उसको दिल का हाल बताना है।
ये बताना बहुत ज़रूरी है कि 1996 में PINK रिलीज़ नहीं हुई थी।
घर में सत्यनारायण की कथा थी बस दिमाग लगाया कि मौका मिलते ही लाउडस्पीकर पे एक गाना बजेगा जिसमे कि उसका नाम आता है।
हम दो हाथ और आगे उसको बता आये कि आज कॉलोनी में हम तुम्हारा नाम चिल्लायेंगे। "रोजा" 1992 में रिलीज़ हो चुकी थी। गाना था - छेड़ दो तुम आज कोई प्यार की .....
यहीं पे pause कर दिए और फिर फुल volume पे play . उसका नाम पूरी कॉलोनी में गूंजा। उस दिन लगा कि ऐसा दिमाग सदियों में कभी-कभी पैदा होता है।
अगले दिन निर्णय ले लिया कि उसको love letter उसके घर पे देकर आएंगे। पर डर था कि अगर पकडे गए तो सुताई हो सकती है इसलिए अपने एक दोस्त आशीष शुकला को पकड़ा। वो बेचारा IIT की तैयारी कर रहा था और उसको लगता था कि ऐसे गंदे काम करेगा तो भगवान उसका selection IIT में नहीं होने देंगे. पर उसका डर भी वाजिब था कि अगर उसकी लिखावट पकड़ी गयी तो ? मेरा दिमाग बहुत तेज़ था।
पूरी चिट्ठी scale / ruler या पटरी से लिखी गयी। सारी रेखाएं सीधी थी हर अक्षर कि, जिस से किसी की राइटिंग पहचानी न जाये। चिट्ठी घर पहुंचनी थी और इसके लिए ज़रूरी था कि माँ-बाप किसी काम उसके घर भेजे. मेरे बाप को नयी नयी नोटों का बहुत शौक था और उनके पापा बैंक में थे बस फिर मेरा दिमाग चला और नोटों के आदान -प्रदान के दौरान एक दिन चिट्ठी उसके हवाले कर दी.
जवाब का इंतज़ार करता रहा पर कोई जवाब नहीं आया।
दिन चढ़ते गए और उसका भाई जिसको घर में ट्यूशन पढ़ाते थे वो साला (द्विअर्थी शब्द) पढ़े न और घर जाकर बोल दे कि मैं घर पे नहीं रहता जब वो पढ़ने आता है. कई कारणों से गुस्सा चरम पे था , अगले ही दिन साले को जम कर कूट दिया। 5th class में पढता था लौंडे के गाल पे मेरी उँगलियों के निशान पड़ गए। वो शाम को मिली दूध लेने की जगह पे, मेरी ट्यूशन की फीस दी और बोला तुमको मेरे भाई नहीं मारना चाहिए था। हमारा सबसे बड़ा भाई नदी में डूब के मर गया था , ये मुझसे 9 साल छोटा है। उसने मेरी चिट्ठी लौटाई और आँखों में आंसू लिए, बिना दूध लिए चली गयी।
फिर वो नहीं मिली।
मैं उसकी याद में बहुत दिनों तक "पापा कहते हैं " का कैसेट सुनता रहा फिर एक दिन कोई और फिल्म रिलीज़ हुई और गाना बदल गया।
आशीष शुकला का एडमिशन कभी भी IIT में नहीं हुआ और उस चिट्ठी के लिए वो मुझे कभी माफ़ नहीं कर पाया

Monday, March 09, 2015

खंजर



 

                                           


                                    वो ताउम्र खंजर लिए हमसाया रहा
                                        

                                    काफ़िर भी कैसे कहूँ जिसने हलाल किया है...





Monday, October 13, 2014

सांप


मेरे बाजुओं से चन्दन की खुशबु  आने लगी है 

                                     लगता है आस्तीनों के सांप अब बड़े हो चले हैं 




चाची चौधरी